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Saturday, June 25, 2011

वास्तु अनुसार कैसा हो घर का प्रवेश द्वार...ध्यान रखने योग्य कुछ बाते....


जिस प्रकार मनुष्य के शारीर में रोग के प्रविष्ट करने का मुख्य मार्ग मुख होता है उसी प्रकार किसी भी प्रकार की समस्या के भवन में प्रवेश का सरल मार्ग भवन का प्रवेश द्वार ही होता है इसलिए इसका वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व है।गृह के मुख्य द्वार को शास्त्र में गृहमुख माना गया है। यह परिवार व गृहस्वामी की शालीनता, समृद्धि व विद्वत्ता दर्शाता है। इसलिए मुख्य द्वार को हमेशा अन्य द्वारों की अपेक्षा प्रधान, वृहद् व सुसज्जित रखने की प्रथा रही है। पौराणिक भारतीय संस्कृति व परम्परानुसार इसे कलश, नारियल व पुष्प, अशोक, केले के पत्र से या स्वास्तिक आदि से अथवा उनके चित्रों से सुसज्जित करने की प्रथा है | जो आज के इस अध्युनिक युग के शहरी जीवन में भोग, विलासिता के बीच कही विलुप्त सी हो गई है | मुख्य द्वार चार भुजाओं की चौखट वाला होना अनिवार्य है। इसे दहलीज भी कहते हैं। यह भवन में निवास करने वाले सदस्यों में शुभ व उत्तम संस्कार का संगरक्षक व पोषक है | पुरानी मान्यता के अनुसार ऐसे भवन जिनमे चौखट या दहलीज न हो उसे बड़ा अशुभ संकेत मानते थे, मान्यता है की माँ लक्ष्मी ऐसे घर में प्रवेश ही नहीं करती जहाँ प्रवेश द्वार पर चौखट न हो और ऐसे घर के सदस्य संस्कारहीन हो जाते है | इसकी दूसरी अनिवार्यता यह है की इससे भवन में गंदगी भी कम प्रवेश कर पाती है तथा नकारात्मक उर्जाओ या किसी शत्रु द्वारा किया गया कोई भी नीच कर्म भी भवन में प्रवेश नहीं कर पाता | चौखट अथवा दहलीज पुरातनकाल से ही हमारे संस्कार व जीवनशैली का एक प्रमुख अंग रही है | इनपर कितने सारे क्षेत्रीय मुहावरे, लोकौक्तिया आधारित है |

- यदि आपका मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर अथवा पूर्व में है तो इसे हरे व पीले, गुलाबी रंग से रंगवाना शुभ होगा यदि यह दक्षिण है तो लाल और पश्चिम है तो हल्का नीला, भूरा, सफ़ेद रंग प्रयोग कर सकते है यह वास्तु सम्मत है |

- प्रातः मुख्य द्वार खोल कर सर्वप्रथम दहलीज पर जल छिड़कना चाहिए जिससे रात में वहां एकत्रित हुई दूषित ऊर्जा दूर हो जाएं तथा गृह में प्रवेश ना पाए और लक्ष्मी आने का मार्ग प्रशस्त हो |

- मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों तरफ (अगल बगल) व ऊपर रोली, कुमकुम, हल्दी, केसर आदि घोलकर स्वास्तिक व ओमकार (ॐ ) का शुभ चिन्ह बनाएं।

- मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर अपने सामर्थानुसार रंगोली बनाना या बनवाना शुभ होता है जो माँ लक्ष्मी को आकृष्ट करता है व नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रवेश को रोकता है।

-मुख्य द्वार को कलश, नारियल, पुष्प, अशोक व केले के पत्र से या स्वास्तिक आदि से सुसज्जित रखने का प्रयास करे जिससे यह अन्य द्वारो से भिन्न व विशेष दिखे |

- मुख्य द्वार चार भुजाओं की चौखट वाला होना अनिवार्य है। जिससे घर में संस्कार बने रहते है और माँ लक्ष्मी भी ऐसे ही घर में प्रवेश करती है|

- घर के सदस्यों व गृह लक्ष्मी की ज़िम्मेदारी है की सूर्योदय उपरांत ही मुख्य द्वार को साफ़ सुथरा व सुसज्जित रखे |

Friday, June 24, 2011

आग्नेय कोण में क्या करे और क्या न करे....?

भवन की आग्नेय दिशा अर्थात पूर्व दक्षिण का कोना अग्नि का स्थान है जिसके स्वामी दैत्य गुरु श्री शुक्राचार्य है परन्तु अग्नि का स्थान होने से मंगल देव का भी समान आधिपत्य है | 
क्या हो- 
- यह स्थान भवन में रसोई का सबसे उपयुक्त स्थान है | जिसमे भोजन पूर्व दिशा की तरफ मुख कर बनाया जाये |
- यहाँ पर विद्युत उपकरण आदि भी  रखे जा सकते है |
- यह स्थान भवन में ईशान और वायव्य से ऊंचा लेकिन नैऋत्य से नीचा रहना चाहिए | 
- जेनेरेटर, इन्वेर्टर, बिजली का मीटर आदि यहाँ रखे |
- यदि संयुक्त परिवार है और घर में बच्चे भी परिवार वाले विवाहित है तो घर के छोटे बेटे का कमरा यहाँ  बना सकते है |

क्या न हो- 
- आग्नेय कोण का किसी भी दिशा में बढ़ना शुभ नहीं होता, इसलिए इसे संशोधित कर वर्गाकार या आयताकार कर लेना चाहिए | 
- यहाँ कभी भी जलस्थान या बोरिंग नहीं होनी चाहिए | ऐसा होने पर यह स्थान बेहद मारक प्रभाव देने लगता है | 
-  यहाँ कभी भी सेप्टिक टेंक नहीं होनी चाहिए |
- यह स्थान कभी भी खुला नहीं छोड़ना चाहिए |
- यह स्थान घर में सबसे ऊँचा भी न हो |
- इस स्थान पर स्टोर भी न बनाये |

नैऋत्य दिशा में क्या हो, क्या न हो....?

नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम का कोना) कोण वास्तु में राहु केतु की दिशा बताई गई है | नैऋत्य कोण के बढ़े होने से असहनीय स्वस्थ्य पीड़ा व अन्य गंभीर परेशानियां पैदा होती हैं और यदि यह खुला रह जाये तो ना ना प्रकार की समस्या घर कर जाती है इसलिए इस स्थान का किसी भी परिस्थिति में खुला या बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए | इस स्थान में दोष होना घर पर प्रेत बढाओ व शक्तियों को भी आमंत्रित करता है तथा परिवार के जो पितृ देवता है उनकी भी कृपा नहीं मिलती अथवा यह पितृदोष का भी सूचक है | 

क्या हो-
- सदैव ही इस स्थान का ऊँचा व भारी होना बहुत ही आवश्यक है | 
- यह स्थान घर के वरिष्ट व्यक्ति व प्रधान कक्ष का स्थान होता है | 
- यह स्थान शौचालय, स्टोर व भारी सामान के भण्डार के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है |
- इस स्थान पर आवश्यकता पड़ने पर जल भण्डारण (ओवर हेड टंक) की व्यस्था की जा सकती है |
- यह स्थान शौचालय के लिए भी उपयुक्त है |
 
क्या न हो-
- गलती से भी इस कोने में कोई बोरिंग, गड्ढा नहीं होना चाहिए | 
- बच्चो या मेहमानों अथवा किरायेदारो को इस दिशा में स्थान कदापि न दे |
- इस स्थान को बिलकुल भी खुला व मालिक से रहित न छोड़े |
- यहाँ लान, पार्क या बगीचा न बनाये |
- यहाँ बिजली से सम्बंधित उपकरण रखने से बचना चाहिए |

पश्चिम दिशा में क्या हो, क्या न हो...?

कही पश्चिम दिशा का वास्तु दोष तो आप की उन्नति में बाधक नहीं...?
हानिकारक है पश्चिम दिशा का बढ़ना या खुला होना...?
यदि भवन में पश्चिम दिशा जादा खुल या हलकी होगी तो घर में रहनेवालो को शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक समस्या बनी रहेगी क्यूंकि यह दिशा शनि देव तथा वरुण देव की दिशा है और सूर्य देव यहाँ अस्त होते है जिस अवस्था में सूर्य से सबसे जादा नकारात्मक उर्जा उत्सर्जित होती है और इसलिए इस दिशा को बंद व भरी रखने का विधान है | जितना इस दिशा का खुला होना नुक्सान दायक है उतना ही घटना या बढ़ना भी |


क्या हो-
- क्यूंकि यह स्थान वरुण देवता का भी है तो यहाँ ओवरहेड रखने का स्थान बनाये |
- इसके आलावा यहाँ स्टोर का स्थान भी उत्तम है |
- भोजन कक्ष का स्थान भी उत्तम है |
- अन्न भंडार का स्थान भी उत्तम है |
- गौ शाला यहाँ सबसे अच्छी मानी गई है |
- वाहन रखने का स्थान सबसे उत्तम है |

क्या न हो-
- यहाँ बच्चो को स्थान न दे |
- बिजली का मीटर यहाँ न हो |
- घर का प्रमुख व्यक्ति यहाँ न रहे |
- यहाँ पूजा स्थान न बनाये |
- कोई बोरिंग या कुआँ नहीं होना चाहिए | 

वायव्य कोण में क्या हो, क्या न हो...?

वायव्य कोण पर वरुण देव का पूर्ण अधिकार है | वायव्य दिशा को नैऋत्य तथा आग्नेय से नीचा रखने पर शुभ फल मिलता है।

क्या हो-
- घर में जल भण्डारण हेतु सभी टंकियां इस स्थान पर रखने का निर्देश प्राप्त होता है |
- यह स्थान मेहमानों का कक्ष, आगंतुक कक्ष (ड्राइंग रूम) के लिए उत्तम है |
- यहाँ विवाह योग्य कन्या का कमरा बहुत अच्छा माना गया है |
- यहाँ किरायेदारों का कमरा होना बहुत लाभकारी होता है |
- अन्न भण्डार, स्टोर के लिए भी यह स्थान ठीक है |
- यहाँ वाहन तथा पशु का स्थान आदि बनाना शास्त्र सम्मत है |
- घर में काम करने वाले कर्मचारी का स्थान भी उपयुक्त होता है |
- वायव्य की चारदिवारी को मोटा और ऊँचा बनाये |
- इस स्थान पर निर्माण होना आवश्यक है अत: इसे निर्मित रखें |
- सीढियां बनाने का सबसे उपयुक्त स्थान होता है |
- यहाँ संयुक्त परिवार में बड़े बेटे का स्थान उत्तम है |
क्या न हो- 
- वायव्य कोण को खुला न रखे |
- यह स्थान पर बड़े बुजुर्गो का कमरा न बनवाये | मानसिक तनाव व मनोस्थिति ख़राब हो जाती है | 
- इस स्थान को कभी खाली न रखे अन्यथा दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है।
- वायव्य को ईशान से नीचे कदापि न रखें। ऐसा करने पर शत्रुता और रोग से ग्रस्त रहेंगे।
- वायव्य दिशा में कुआं या गड्ढा न बनवाएं।
- यहाँ सेप्टिक टैंक ना बनवाएं।
- यहाँ बिजली का मीटर न लगाये |

उत्तर दिशा में क्या हो...क्या न हो....?

वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को माँ लक्ष्मी व कुबेर की दिशा का संबोधन दिया गया है शयद ऐसा इसलिए क्यूंकि उत्तर दिसा में शुभ उर्जा का सबसे बड़ा स्तोत्र उत्तरी ध्रुव जो है | यदि उत्तर दिशा बाधित या दोषग्रस्त हो जाये तो घर की सारी समृद्धि चली जाती है और फिर उस घर में दरिद्रता, दुःख, क्लेश, का निवास हो जाता है | तो आइये.....चर्चा करते है कुछ ऐसा सूत्रों की जो घर में उत्तर दिशा का दोष दूर करने में सहायक है | वास्तु में उत्तर दिशा का स्वामी बुध ग्रह को बताया गया है |

क्या हो- 
- उत्तर दिशा को सदैव हल्का होना चाहिए |
- उत्तर दिशा में खुला स्थान अधिक रखे |
- इस स्थान को सदैव साफ़ सुथरा व जागृत रखे |
- घर में हमेशा उत्तर दिशा की तरफ ढाल अधिक हो |
- अधिक से अधिक जल स्थान, बोरिंग, कुआँ, इस स्थान में ही हो |
- यहाँ पूजा का स्थान, धन स्थान व बच्चो का कमरा बनाये |
- यह स्थान प्रवेश द्वार के लिए विशेष शुभ बताया गया है |
- बच्चो का अध्यन कक्ष या स्वयं हेतु साधना कक्ष यहाँ लाभ देता है |

क्या न हो- 
- उत्तर दिशा को भरी गलती से भी न करे |
- इस स्थान को कभी भी गन्दा व अशुद्ध न करे |
- यहाँ अग्नि का स्थान न बनाये |
- उत्तर दिशा में शौचालय न हो |
- घर के बड़े लोगो का कमरा यहाँ न बनाये |
- यहाँ स्टोर आदि बना कर इस स्थान को भारी व गन्दा न करे |
- उत्तर दिशा को बाधित न होने दे |

Sunday, June 19, 2011

क्या है वायव्य कोण के वास्तु दोष का सटीक, प्रमाणिक उपाय....?


वायव्य कोण पर वरुण देव का पूर्ण अधिकार है | इस स्थान का सीधा सम्बन्ध घर में भूतल पर वायु व जल से प्रभाव से है | इसलिए घर में जल भण्डारण हेतु सभी टंकियां इस स्थान पर रखने का निर्देश प्राप्त होता है | उसके आलावा यह स्थान मेहमानों का कक्ष, विवाह योग्य कन्या का कक्ष, घर के बड़े बेटे - बहु का कक्ष, अन्न भण्डार, स्टोर, वाहन तथा पशु का स्थान, आगंतुक कक्ष (ड्राइंग रूम) आदि बनाना शास्त्र सम्मत है |  

- पूर्णिमा की रात्रि चावल - दूध की खीर बनाकर चन्द्रदेव को समर्पित कर व ब्रह्मण को दान कर स्वयं ग्रहण करे |  
- चन्द्र व गंगाधारी महादेव शिव, वरुणदेव अथवा चंद्र के मंत्रों का जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।
- वायव्य क्षेत्र में (स्वाति जल) वर्षा का जल किसी कांच की हरी या नीली बोतल में भर कर रखना चमत्कारिक लाभ देता है |
- इस दिशा में एक छोटा फव्वारा या कृतिम मछलीघर जिसमे आठ सुनहरी मछलियाँ व एक काली मछली हो वह स्थापित करें।

- अपनी मां का यथासंभव आदर करें, सुबह उठकर उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें और शुभ अवसरों पर उन्हें खीर खिलाएं।
- किसी तीर्थ या धार्मिक महत्व्य के जलस्थान, नदी में पूर्णिमा के दिन चंद्रदेव का ध्यान कर दूध का अर्घ देना तत्काल लाभ देता है |
- वायव्य दिशा के दोष निवारण हेतु घर के पूजा स्थान में प्राण-प्रतिष्ठित मारुति यंत्र, सोम यन्त्र एवं चंद्र यंत्र की स्थापना कर पूजन करें।
- यदि इस स्थान पर किसी भी प्रकार का दोष हो तो वहां मारुतिनंदन श्री हनुमान या श्री शिव जिन्होंने मस्तक पर चन्द्र व जटा में माँ गंगा को धारण किया है को स्थापित करे |

कैसे करे नैऋत्य दिशा के गंभीर वास्तु दोष का उपाय.....?




नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम का कोना) कोण वास्तु में राहु केतु की दिशा बताई गई है | नैऋत्य कोण के बढ़े होने से असहनीय स्वस्थ्य पीड़ा व अन्य गंभीर परेशानियां पैदा होती हैं और यदि यह खुला रह जाये तो ना ना प्रकार की समस्या घर कर जाती है इसलिए इस स्थान का किसी भी परिस्थिति में खुला या बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए | गलती से भी इस कोने में कोई बोरिंग, गड्ढा नहीं होना चाहिए | सदैव ही इस स्थान का ऊँचा होना, भारी होना बहुत ही आवश्यक है | यह स्थान घर के वरिष्ट व्यक्ति का स्थान होता है | इस स्थान में दोष होना घर पर प्रेत बढाओ व शक्तियों को भी आमंत्रित करता है तथा परिवार के जो पितृ देवता है उनकी भी कृपा नहीं मिलती अथवा यह पितृदोष का भी सूचक है | यदि नैऋत्य में किसी भी प्रकार का दोष है तो निम्न उपाय बहुत ही लाभकारी होंगे :- 

- राहु यंत्र की प्राण - प्रतिष्टा कर स्थापना विधिपूर्वक करें।
- पितृपक्ष अथवा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी व अमावस्या विधिपूर्वक पूरी श्रद्धा से श्राद्धकर्म का संपादन कर अपने पूर्वजों को संतुष्ट कर कृपा ले |
- वास्तु दोष निवारण यन्त्र की विधिपूर्वक पूरी श्रद्धा से प्राण - प्रतिष्टा कर स्थापना करना भी नैऋत्य दिशा के दोष को दूर करने के अत्यंत लाभकारी है |

- राहु - केतु के मंत्रों का जप स्वयं करें अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से कराएं एवं इनसे सम्बंधित दान किसी दरिद्रनारायण को नियमित करे तो निश्चित लाभ होगा |    
- पूरे कुटुंब के साथ महादेव शिव का दुग्धाभिषेक करे तथा महादेव को कांस्य, रजत या स्वर्ण निर्मित नाग - नागिन का जोड़ा अर्पित कर उसे नैऋत्य दिशा में स्थापित करे |

Tuesday, December 16, 2008

Astrology & Vedic Vastu Shastra Consultancy For Healthy Living...

Working as a renound Celebrity Vastu Expert and Astrologer.

 

 Hi......there....!
This is Vaibhava Nath Sharma, famous Vastu consultant from the Holy City n the Cultural Capital of the World"KASHI".I belong to a great family of "ROYAL ASTROLOGERS"(Raj Jyotishi)of 365 ROYAL STATES of INDIA....In the younger generation i have taken responsibility to continue the Name n Legacy of my Fore fathers to the New Limits n Dimensions with latest means like T.V. RADIO,INTERNET etc.Might have seen me on Several National n International News Channels & T.V. Shows with celebrities...So..get connected with me...and get the easier n simpler solutions of your Serious problems.......without TENSION...


yours Truely,

Vaibhava Nath Sharma.
(Astro Vastu Consultant)
+91-9990724131