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Thursday, June 30, 2011

भैरव साधना का अद्भुद चमत्कार

यदि आप किसी गंभीर समस्या में घिर जाये और चाहते हो त्वरित उपाय तो एक ऐसा उपाय जो जीवन पर छाए काले बादल को तुरंत मिटाए

- शनिवार और रविवार को श्री भैरव मंदिर में जाकर सिंदूर व चमाली के तेल का चोला अर्पित करे |
- शनिवार या रविवार को भैरव मंदिर में कपूर की आरती व काजल का दान करने से कष्ट मिटते है |
- किसी गंभीर समस्या के निवारण हेतु उरद की दाल के एक सो आठ बारे बना कर उसकी माला बनाये और श्री भैरवनाथ जी को अर्पित कर सदर उनकी आरती करे |
- पारिवारिक या न्यायिक विवाद के निदान हेतु सरसों का तेल, खोये से निर्मित मिस्ठान, काले वस्त्र, एक जलदार नारियल, कपूर, नीबू आदि समर्पित करे |
- उपरी बाधा निवारण हेतु भैरवाष्टक का नियमित आठ पाठ कर जल को फुक कर पीड़ित व्यक्ति को पिला दे | हर प्रकार की समस्या का निदान होगा |

पांच मिस्ठान करेगी चमत्कार

जब व्यक्ति किसी गंभीर समस्या में घिर जाये, जीवन में आगे बढ़ने का कोई मार्ग न दिखे, भविष्य अन्धकारमय दिखने लगे जब सारे मार्ग बंद हो जाये तो इस प्रयोग को करे |

यह प्रयोग बुधवार, शनिवार को मिलाकर कुल 11 बार करे :-

एक स्टील का लोटा लेकर उसमे दूध, जल, शहद, गुड, काला तिल मिलाकर एक मिश्रण तैयार कर ले | फिर यह मिश्रण ले कर आस पास किसी पीपल के पेड़ पर जा कर पूरी श्रद्धा से अर्पित करे |
फिर वहां पांच अलग अलग प्रकार मिस्ठान पान के पत्ते पर अर्पित कर एक एक इलाइची, लौंग, सुपारी का भोग अर्पित करे और पूरी श्रद्धा से पांच सुगन्धित अगरबत्ती अर्पित कर साथ परिक्रमा पीपल देव की करे |
इस प्रयोग को करने से किसी भी प्रकार की बाधा होगी वह दूर हो जाएगी और आप सफलता का वरण कर सकेंगे |

अमरनाथ यात्रा का रहस्य व कथा

पुराणों में संस्मरण है कि एक बार माँ पार्वती ने बड़ी उत्सुकता के साथ बाबा श्री विश्वनाथ देवाधिदेव माहदेव से यह प्रश्न किया की ऐसा क्यूँ होता है की आप अजर अमर है और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरुप में आकर फिर से वर्षो की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है | जब मुझे आपको ही प्राप्त करना है तो फिर मेरी यह तपस्या क्यूँ...? मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यूँ....? और आपके कंठ में पड़ी यह नरमुण्ड माला तथा आपके अमर होने का कारण व रहस्यक्या है...? महाकाल ने पहले तो माता को यह गूढ़ रहस्य बताना उचित नहीं समझा परन्तु माता की स्त्री हठ के आगे उनकी एक न चली | तब अन्त्त्वोगत्व्या महादेव शिव को माँ पार्वती को अपनी साधना की अमर कथा जिसे हम अमरत्व की कथा के रूप में जानते है इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में कही | अमरनाथ यात्रा हिन्दी मास के आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास की पूर्णिमा तक होती है, जो अंग्रेजी माह जुलाई से अगस्त तक लगभग ४५ दिन तक चलती है। भगवान शंकर ने माँ पार्वती जी से एकान्त व गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा जिससे कि अमर कथा को कोई भी जीव, व्यक्ति और यहां तक कोई पशु-पक्षी भी न सुन ले। क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता, वह अमर हो जाता। इस कारण शिव जी पार्वती को लेकर किसी गुप्त स्थान की ओर चल पड़े। सबसे पहले भगवान भोले नें अपनी सवारी नन्दी को पहलगाम पर छोड़ दिया, इसीलिए बाबा अमरनाथ की यात्रा पहलगाम से शुरू करने का तात्पर्य या बोध होता है। आगे चलने पर शिव जी ने अपनी जटाओं से चन्द्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया तथा गंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा। आगे की यात्रा में अगला पड़ाव गणेश टॉप पड़ता है, इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया था, जिसको महागुणा का पर्वत भी कहा जाता है। पिस्सू घाटी में पिस्सू नामक कीड़े को भी त्याग दिया। इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को भी अपने से अलग कर दिया। इसके बाद मां पार्वती संग एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये। कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर प्रवेश कर अमर कथा को न सुन सके इसलिए शिव जी ने अपने चमत्कार से गुफा के चारों ओर आग प्रज्जवलित कर दी। फिर शिव जी ने जीवन की अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया। कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिव जी को पता नहीं चला. भगवन शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे | इस समय दो सफेद कबूतर श्री शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे. शिव जी को लग रहा था कि माँ पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं. इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली. 
कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं | शिव जी ने सोचा कि पार्वती सो रही हैं तब इसे सुन कौन रहा था | तब महादेव की दृष्टि तब कबूतरों पर पड़ी, महादेव शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए | इस पर कबूतरों ने शिव जी कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी | इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगो | 

अत: यह कबूतर का जोड़ा अजर अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है | और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा। जहां गुफा के अंदर भगवान शंकर बर्फ के प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। पवित्र गुफा में मां पार्वती के अलावा गणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन करे जा सकते हैं। इस पवित्र गुफा की खोज के बारे में पुराणों में भी एक कथा प्रचलित है कि एक बार एक गड़रिये को एक साधू मिला, जिसने उस गड़रिये को कोयले से भरी एक बोरी दी। जिसे गड़रिया अपने कन्धे पर लाद कर अपने घर को चल दिया। घर जाकर उसने बोरी खोली। वह आश्चर्यचकित हुआ, क्योंकि कोयले की बोरी अब सोने के सिक्कों की हो चुकी थी। इसके बाद वह गड़रिया साधू से मिलने व धन्यवाद देने के लिए उसी स्थान पर गया, जहां पर वह साधू से मिला था। परंतु वहां पर उसे साधू नहीं मिला, बल्कि उसे ठीक उसी जगह एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया जैसे ही उस गुफा के अंदर गया तो उसने वहां पर देखा कि भगवान भोले शंकर बर्फ के बने शिवलिंग के आकार में स्थापित थे। उसने वापस आकर सबको यह कहानी बताई। और इस तरह भोले बाबा की पवित्र अमरनाथ गुफा की खोज हुई और धीरे-धीरे करते दूर-दूर से भी लोग पवित्र गुफा एवं बाबा के दर्शन को पहुंचने लगे जो आज तक प्रतिवर्ष जारी है |

श्री अमरनाथ जी के दर्शन से लाभ:-
बाबा अमरनाथ दर्शन का महत्व पुराणों में भी मिलता है। पुराण अनुसार काशी में लिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देनेवाले श्री अमरनाथ के दर्शन है।

घोड़े की नाल के दस चमत्कारी प्रयोग

घोड़े की नाल के दस प्रयोग :-

काले घोड़े की नाल एक ऐसी वास्तु है जो शनि समबधित किसी भी पीड़ा जैसे शनि की अशुभ दशा, ढैया, साढ़ेसाती शनि का कोई अशुभ योग आदि..हर पीड़ा में सामान रूप से चमत्कारी है बशर्ते यह पूर्ण रूपेण सिद्ध हो....यहाँ सिद्ध से आशय पहले काले घोड़े के प्रयोग में हो फिर शुभ महूर्त में शनि मंत्रो से व वैदिक प्रक्रिया द्वारा प्रतिष्ठित की गई हो | सिद्ध या उर्जावान काले घोड़े की नाल को परखने का एक बहुत ही प्रमाणिक तरीका है | उसे आप कुछ घंटो (कम से कम ५ से ८ घंटे) के लिए मक्के में रख दिया जाये और फिर जब कुछ समय बाद देखा जाये तो सही सिद्ध घोड़े की नाल उस मक्के को लावे में बदल चुकी होगी अर्थात उसे पका देगी....|

१- काले वस्त्र में लपेट कर अनाज में रख दो तो अनाज में वृद्धि हो |
२- काले वस्त्र में लपेट कर तिजोरी में रख दो तो धन में वृद्धि हो |
३- अंगूठी या छल्ला बनाकर धारण करे तो शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिले |
४- द्वार पर सीधा लगाये तो दैवीय कृपा मिले |
५- द्वार पर उल्टा लगाओ तो भूत, प्रेत, या किसी भी तंत्र मंत्र से बचाव हो |
६- शनि के प्रकोप से बचाव हेतु काले घोड़े की नाल से बना छल्ला सीधे हाथ में धारण करें।
७- काले घोड़े की नाल से चार कील बनवाये और शनि पीड़ित व्यक्ति के बिस्तर में चारो पायो में लगा दे |
८- काले घोड़े की नाल से चार कील बनवाये और शनि पीड़ित व्यक्ति के घर के चारो कोने पे लगाये |
९- काले घोड़े की नाल से एक कील बनाकर सवा किलो उरद की दाल में रख कर एक नारियल के साथ जल में प्रवाहित करे |
१०- काले घोड़े की नाल से एक कील या छल्ला बनवा ले, शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भर कर है छल्ला या कील डाल कर अपना मुख देखे और पीपल के पेड़ के नीचे रख दे | 

1 जुलाई 2011 को सूर्य ग्रहण ---- क्या करे...? क्या न करे...?


आषाढ़ मॉस की अमावस्या को पड़ने वाला यह सूर्य ग्रहण दोपहर 1:24 बजे से शुरू होगा और 2:55 बजे तक रहेगा। यह ग्रहण आर्द्रा नक्षत्र में लगेगा | इस ग्रहण से विशेषकर वृषभ, मिथुन, कर्क राशी अनिष्टकारी प्रभाव से प्रभावित होंगे अत: भारतवर्ष की कुंडली अनुसार वृषभ राशी है जिस कारण राष्ट्र में आगामी भविष्य में दैवीय, प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, आंधी, तूफान व भूकंप के खतरे भी बनने लगे हैं। राजनितिक संकट गहरा सकते है | दुर्घटनाएँ आदि होने की आशंका है | यह ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा, लेकिन फिर भी इसके प्रभाव भारत में अवश्य देखने को मिलेंगे। क्यूंकि इस ग्रहण का प्रभाव भारत में नहीं है तो यहाँ पर सूतक आदि का विचार नहीं किया जाएगा | फिर भी ग्रहण काल में स्नान तथा दान करना लाभ देगा | अमूमन सूर्यग्रहण का सूतक 12 घण्टे पहले से आरम्भ हो जाता है तो इस प्रकार सूतक काल सुबह से ही आरम्भ माना जा सकता है | ग्रहण के समय शुभ कार्य करना वर्जित होता है | इस सूर्यग्रहण के समय सूर्य का केवल 10 फीसदी भाग ही ग्रहण के प्रभाव में रहेगा अर्थात 10 फीसदी भाग ही कटा हुआ नजर आएगा |



मेष:- रुके हुए व व्यापारिक कार्यो में लाभ संभव साथ ही स्वस्थ्य की समस्या रहेगी |
क्या करे - महामृतुन्जय मंत्र जा जाप करे |
क्या न करे- असमय भोजन न करे |


वृषभ:- परिवार में भाई बन्धु से वाद विवाद संभव | मगलिक व धार्मिक कार्यो से लाभ होगा |
क्या करे - महादेव शिव पर जल चढ़ाये |
क्या न करे- तर्क - कुतर्क न करे |


मिथुन:- कार्यक्षेत्र में उच्चाधाकरी से तनाव व व्यापार में सरकारी तंत्र से बाधा हो सकती है |
क्या करे - हनुमद आराधना करे |
क्या न करे- जादा तनाव न ले |


कर्क:- परिवार व स्वस्थ्य से कष्ट ही मिलेगा | अत: सावधान रहे |
क्या करे - सोच समझ कर बात करे |
क्या न करे- विवाद से बचे |


सिंह:- कार्यक्षेत्र , व्यापार में सफलता, अचानक यात्रा से तनाव बढ़ सकता है।
क्या करे - माँ अन्नपूर्ण को नमन करे |
क्या न करे- यात्रा न करे |


कन्‍या:- आर्थिक हानि व धनाभाव समक्ष आएगा | शत्रुबाधा भी संभव है |
क्या करे - कार्य की गुप्त बात हर किसी से चर्चा न करे |
क्या न करे- निवेश न करे |

तुला:- व्यर्थ का व्ययभार बढेगा | कार्यक्षेत्र में व्यर्थ की भागदौड़ व तनाव होगा |
क्या करे - खर्च को नियंत्रित करे |
क्या न करे- भागदौड़ न करे |


वृश्चिक:- आर्थिक, व्यापारिक नुक्सान के साथ पारिवारिक तनाव, भेद भाव बढेगा |
क्या करे - सुंदरकांड, हनुमान चालीसा का पाठ करे |
क्या न करे- किसी का अँधा विश्वास न करे |

धनु:- कला से जुडाव बढेगा व कालाकारो को विशेष लाभ होगा | परिवार में किसी के स्वस्थ्य की चिंता होगी |
क्या करे - विष्णु लक्ष्मी की आराधना करे |
क्या न करे- चिंता न करे


मकर:- आर्थिक लाभ व भौतिक सुखों में वृद्धि होगी, मानसिक तनाव से मुक्त हो सकेंगे |
क्या करे - शिव आराधना फलदाई होगी |
क्या न करे- गलत संगत से बचे |


कुंभ:- विशेष आर्थिक, व्यापारिक, राजीनीतिक लाभ मिलेगा, चल रहे प्रयास फलदायी होगा। चतुर्मुख लाभ संभव |
क्या करे - भैरव मंदिर में दान करे |
क्या न करे- क्रोध न करे |

मीन:- नई व्यापारिक व निवेश योजनाये फलीभूत होंगी।
क्या करे - विष्णु आराधना करे |
क्या न करे- लौह, धातु निर्मित औजार तथा वाहन का प्रयोग सावधानी से करे |

Saturday, June 25, 2011

वास्तु अनुसार कैसा हो घर का प्रवेश द्वार...ध्यान रखने योग्य कुछ बाते....


जिस प्रकार मनुष्य के शारीर में रोग के प्रविष्ट करने का मुख्य मार्ग मुख होता है उसी प्रकार किसी भी प्रकार की समस्या के भवन में प्रवेश का सरल मार्ग भवन का प्रवेश द्वार ही होता है इसलिए इसका वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व है।गृह के मुख्य द्वार को शास्त्र में गृहमुख माना गया है। यह परिवार व गृहस्वामी की शालीनता, समृद्धि व विद्वत्ता दर्शाता है। इसलिए मुख्य द्वार को हमेशा अन्य द्वारों की अपेक्षा प्रधान, वृहद् व सुसज्जित रखने की प्रथा रही है। पौराणिक भारतीय संस्कृति व परम्परानुसार इसे कलश, नारियल व पुष्प, अशोक, केले के पत्र से या स्वास्तिक आदि से अथवा उनके चित्रों से सुसज्जित करने की प्रथा है | जो आज के इस अध्युनिक युग के शहरी जीवन में भोग, विलासिता के बीच कही विलुप्त सी हो गई है | मुख्य द्वार चार भुजाओं की चौखट वाला होना अनिवार्य है। इसे दहलीज भी कहते हैं। यह भवन में निवास करने वाले सदस्यों में शुभ व उत्तम संस्कार का संगरक्षक व पोषक है | पुरानी मान्यता के अनुसार ऐसे भवन जिनमे चौखट या दहलीज न हो उसे बड़ा अशुभ संकेत मानते थे, मान्यता है की माँ लक्ष्मी ऐसे घर में प्रवेश ही नहीं करती जहाँ प्रवेश द्वार पर चौखट न हो और ऐसे घर के सदस्य संस्कारहीन हो जाते है | इसकी दूसरी अनिवार्यता यह है की इससे भवन में गंदगी भी कम प्रवेश कर पाती है तथा नकारात्मक उर्जाओ या किसी शत्रु द्वारा किया गया कोई भी नीच कर्म भी भवन में प्रवेश नहीं कर पाता | चौखट अथवा दहलीज पुरातनकाल से ही हमारे संस्कार व जीवनशैली का एक प्रमुख अंग रही है | इनपर कितने सारे क्षेत्रीय मुहावरे, लोकौक्तिया आधारित है |

- यदि आपका मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर अथवा पूर्व में है तो इसे हरे व पीले, गुलाबी रंग से रंगवाना शुभ होगा यदि यह दक्षिण है तो लाल और पश्चिम है तो हल्का नीला, भूरा, सफ़ेद रंग प्रयोग कर सकते है यह वास्तु सम्मत है |

- प्रातः मुख्य द्वार खोल कर सर्वप्रथम दहलीज पर जल छिड़कना चाहिए जिससे रात में वहां एकत्रित हुई दूषित ऊर्जा दूर हो जाएं तथा गृह में प्रवेश ना पाए और लक्ष्मी आने का मार्ग प्रशस्त हो |

- मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों तरफ (अगल बगल) व ऊपर रोली, कुमकुम, हल्दी, केसर आदि घोलकर स्वास्तिक व ओमकार (ॐ ) का शुभ चिन्ह बनाएं।

- मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर अपने सामर्थानुसार रंगोली बनाना या बनवाना शुभ होता है जो माँ लक्ष्मी को आकृष्ट करता है व नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रवेश को रोकता है।

-मुख्य द्वार को कलश, नारियल, पुष्प, अशोक व केले के पत्र से या स्वास्तिक आदि से सुसज्जित रखने का प्रयास करे जिससे यह अन्य द्वारो से भिन्न व विशेष दिखे |

- मुख्य द्वार चार भुजाओं की चौखट वाला होना अनिवार्य है। जिससे घर में संस्कार बने रहते है और माँ लक्ष्मी भी ऐसे ही घर में प्रवेश करती है|

- घर के सदस्यों व गृह लक्ष्मी की ज़िम्मेदारी है की सूर्योदय उपरांत ही मुख्य द्वार को साफ़ सुथरा व सुसज्जित रखे |

Friday, June 24, 2011

आग्नेय कोण में क्या करे और क्या न करे....?

भवन की आग्नेय दिशा अर्थात पूर्व दक्षिण का कोना अग्नि का स्थान है जिसके स्वामी दैत्य गुरु श्री शुक्राचार्य है परन्तु अग्नि का स्थान होने से मंगल देव का भी समान आधिपत्य है | 
क्या हो- 
- यह स्थान भवन में रसोई का सबसे उपयुक्त स्थान है | जिसमे भोजन पूर्व दिशा की तरफ मुख कर बनाया जाये |
- यहाँ पर विद्युत उपकरण आदि भी  रखे जा सकते है |
- यह स्थान भवन में ईशान और वायव्य से ऊंचा लेकिन नैऋत्य से नीचा रहना चाहिए | 
- जेनेरेटर, इन्वेर्टर, बिजली का मीटर आदि यहाँ रखे |
- यदि संयुक्त परिवार है और घर में बच्चे भी परिवार वाले विवाहित है तो घर के छोटे बेटे का कमरा यहाँ  बना सकते है |

क्या न हो- 
- आग्नेय कोण का किसी भी दिशा में बढ़ना शुभ नहीं होता, इसलिए इसे संशोधित कर वर्गाकार या आयताकार कर लेना चाहिए | 
- यहाँ कभी भी जलस्थान या बोरिंग नहीं होनी चाहिए | ऐसा होने पर यह स्थान बेहद मारक प्रभाव देने लगता है | 
-  यहाँ कभी भी सेप्टिक टेंक नहीं होनी चाहिए |
- यह स्थान कभी भी खुला नहीं छोड़ना चाहिए |
- यह स्थान घर में सबसे ऊँचा भी न हो |
- इस स्थान पर स्टोर भी न बनाये |

नैऋत्य दिशा में क्या हो, क्या न हो....?

नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम का कोना) कोण वास्तु में राहु केतु की दिशा बताई गई है | नैऋत्य कोण के बढ़े होने से असहनीय स्वस्थ्य पीड़ा व अन्य गंभीर परेशानियां पैदा होती हैं और यदि यह खुला रह जाये तो ना ना प्रकार की समस्या घर कर जाती है इसलिए इस स्थान का किसी भी परिस्थिति में खुला या बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए | इस स्थान में दोष होना घर पर प्रेत बढाओ व शक्तियों को भी आमंत्रित करता है तथा परिवार के जो पितृ देवता है उनकी भी कृपा नहीं मिलती अथवा यह पितृदोष का भी सूचक है | 

क्या हो-
- सदैव ही इस स्थान का ऊँचा व भारी होना बहुत ही आवश्यक है | 
- यह स्थान घर के वरिष्ट व्यक्ति व प्रधान कक्ष का स्थान होता है | 
- यह स्थान शौचालय, स्टोर व भारी सामान के भण्डार के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है |
- इस स्थान पर आवश्यकता पड़ने पर जल भण्डारण (ओवर हेड टंक) की व्यस्था की जा सकती है |
- यह स्थान शौचालय के लिए भी उपयुक्त है |
 
क्या न हो-
- गलती से भी इस कोने में कोई बोरिंग, गड्ढा नहीं होना चाहिए | 
- बच्चो या मेहमानों अथवा किरायेदारो को इस दिशा में स्थान कदापि न दे |
- इस स्थान को बिलकुल भी खुला व मालिक से रहित न छोड़े |
- यहाँ लान, पार्क या बगीचा न बनाये |
- यहाँ बिजली से सम्बंधित उपकरण रखने से बचना चाहिए |

पश्चिम दिशा में क्या हो, क्या न हो...?

कही पश्चिम दिशा का वास्तु दोष तो आप की उन्नति में बाधक नहीं...?
हानिकारक है पश्चिम दिशा का बढ़ना या खुला होना...?
यदि भवन में पश्चिम दिशा जादा खुल या हलकी होगी तो घर में रहनेवालो को शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक समस्या बनी रहेगी क्यूंकि यह दिशा शनि देव तथा वरुण देव की दिशा है और सूर्य देव यहाँ अस्त होते है जिस अवस्था में सूर्य से सबसे जादा नकारात्मक उर्जा उत्सर्जित होती है और इसलिए इस दिशा को बंद व भरी रखने का विधान है | जितना इस दिशा का खुला होना नुक्सान दायक है उतना ही घटना या बढ़ना भी |


क्या हो-
- क्यूंकि यह स्थान वरुण देवता का भी है तो यहाँ ओवरहेड रखने का स्थान बनाये |
- इसके आलावा यहाँ स्टोर का स्थान भी उत्तम है |
- भोजन कक्ष का स्थान भी उत्तम है |
- अन्न भंडार का स्थान भी उत्तम है |
- गौ शाला यहाँ सबसे अच्छी मानी गई है |
- वाहन रखने का स्थान सबसे उत्तम है |

क्या न हो-
- यहाँ बच्चो को स्थान न दे |
- बिजली का मीटर यहाँ न हो |
- घर का प्रमुख व्यक्ति यहाँ न रहे |
- यहाँ पूजा स्थान न बनाये |
- कोई बोरिंग या कुआँ नहीं होना चाहिए | 

वायव्य कोण में क्या हो, क्या न हो...?

वायव्य कोण पर वरुण देव का पूर्ण अधिकार है | वायव्य दिशा को नैऋत्य तथा आग्नेय से नीचा रखने पर शुभ फल मिलता है।

क्या हो-
- घर में जल भण्डारण हेतु सभी टंकियां इस स्थान पर रखने का निर्देश प्राप्त होता है |
- यह स्थान मेहमानों का कक्ष, आगंतुक कक्ष (ड्राइंग रूम) के लिए उत्तम है |
- यहाँ विवाह योग्य कन्या का कमरा बहुत अच्छा माना गया है |
- यहाँ किरायेदारों का कमरा होना बहुत लाभकारी होता है |
- अन्न भण्डार, स्टोर के लिए भी यह स्थान ठीक है |
- यहाँ वाहन तथा पशु का स्थान आदि बनाना शास्त्र सम्मत है |
- घर में काम करने वाले कर्मचारी का स्थान भी उपयुक्त होता है |
- वायव्य की चारदिवारी को मोटा और ऊँचा बनाये |
- इस स्थान पर निर्माण होना आवश्यक है अत: इसे निर्मित रखें |
- सीढियां बनाने का सबसे उपयुक्त स्थान होता है |
- यहाँ संयुक्त परिवार में बड़े बेटे का स्थान उत्तम है |
क्या न हो- 
- वायव्य कोण को खुला न रखे |
- यह स्थान पर बड़े बुजुर्गो का कमरा न बनवाये | मानसिक तनाव व मनोस्थिति ख़राब हो जाती है | 
- इस स्थान को कभी खाली न रखे अन्यथा दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है।
- वायव्य को ईशान से नीचे कदापि न रखें। ऐसा करने पर शत्रुता और रोग से ग्रस्त रहेंगे।
- वायव्य दिशा में कुआं या गड्ढा न बनवाएं।
- यहाँ सेप्टिक टैंक ना बनवाएं।
- यहाँ बिजली का मीटर न लगाये |

उत्तर दिशा में क्या हो...क्या न हो....?

वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को माँ लक्ष्मी व कुबेर की दिशा का संबोधन दिया गया है शयद ऐसा इसलिए क्यूंकि उत्तर दिसा में शुभ उर्जा का सबसे बड़ा स्तोत्र उत्तरी ध्रुव जो है | यदि उत्तर दिशा बाधित या दोषग्रस्त हो जाये तो घर की सारी समृद्धि चली जाती है और फिर उस घर में दरिद्रता, दुःख, क्लेश, का निवास हो जाता है | तो आइये.....चर्चा करते है कुछ ऐसा सूत्रों की जो घर में उत्तर दिशा का दोष दूर करने में सहायक है | वास्तु में उत्तर दिशा का स्वामी बुध ग्रह को बताया गया है |

क्या हो- 
- उत्तर दिशा को सदैव हल्का होना चाहिए |
- उत्तर दिशा में खुला स्थान अधिक रखे |
- इस स्थान को सदैव साफ़ सुथरा व जागृत रखे |
- घर में हमेशा उत्तर दिशा की तरफ ढाल अधिक हो |
- अधिक से अधिक जल स्थान, बोरिंग, कुआँ, इस स्थान में ही हो |
- यहाँ पूजा का स्थान, धन स्थान व बच्चो का कमरा बनाये |
- यह स्थान प्रवेश द्वार के लिए विशेष शुभ बताया गया है |
- बच्चो का अध्यन कक्ष या स्वयं हेतु साधना कक्ष यहाँ लाभ देता है |

क्या न हो- 
- उत्तर दिशा को भरी गलती से भी न करे |
- इस स्थान को कभी भी गन्दा व अशुद्ध न करे |
- यहाँ अग्नि का स्थान न बनाये |
- उत्तर दिशा में शौचालय न हो |
- घर के बड़े लोगो का कमरा यहाँ न बनाये |
- यहाँ स्टोर आदि बना कर इस स्थान को भारी व गन्दा न करे |
- उत्तर दिशा को बाधित न होने दे |

Sunday, June 19, 2011

क्या है वायव्य कोण के वास्तु दोष का सटीक, प्रमाणिक उपाय....?


वायव्य कोण पर वरुण देव का पूर्ण अधिकार है | इस स्थान का सीधा सम्बन्ध घर में भूतल पर वायु व जल से प्रभाव से है | इसलिए घर में जल भण्डारण हेतु सभी टंकियां इस स्थान पर रखने का निर्देश प्राप्त होता है | उसके आलावा यह स्थान मेहमानों का कक्ष, विवाह योग्य कन्या का कक्ष, घर के बड़े बेटे - बहु का कक्ष, अन्न भण्डार, स्टोर, वाहन तथा पशु का स्थान, आगंतुक कक्ष (ड्राइंग रूम) आदि बनाना शास्त्र सम्मत है |  

- पूर्णिमा की रात्रि चावल - दूध की खीर बनाकर चन्द्रदेव को समर्पित कर व ब्रह्मण को दान कर स्वयं ग्रहण करे |  
- चन्द्र व गंगाधारी महादेव शिव, वरुणदेव अथवा चंद्र के मंत्रों का जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।
- वायव्य क्षेत्र में (स्वाति जल) वर्षा का जल किसी कांच की हरी या नीली बोतल में भर कर रखना चमत्कारिक लाभ देता है |
- इस दिशा में एक छोटा फव्वारा या कृतिम मछलीघर जिसमे आठ सुनहरी मछलियाँ व एक काली मछली हो वह स्थापित करें।

- अपनी मां का यथासंभव आदर करें, सुबह उठकर उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें और शुभ अवसरों पर उन्हें खीर खिलाएं।
- किसी तीर्थ या धार्मिक महत्व्य के जलस्थान, नदी में पूर्णिमा के दिन चंद्रदेव का ध्यान कर दूध का अर्घ देना तत्काल लाभ देता है |
- वायव्य दिशा के दोष निवारण हेतु घर के पूजा स्थान में प्राण-प्रतिष्ठित मारुति यंत्र, सोम यन्त्र एवं चंद्र यंत्र की स्थापना कर पूजन करें।
- यदि इस स्थान पर किसी भी प्रकार का दोष हो तो वहां मारुतिनंदन श्री हनुमान या श्री शिव जिन्होंने मस्तक पर चन्द्र व जटा में माँ गंगा को धारण किया है को स्थापित करे |

कैसे करे नैऋत्य दिशा के गंभीर वास्तु दोष का उपाय.....?




नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम का कोना) कोण वास्तु में राहु केतु की दिशा बताई गई है | नैऋत्य कोण के बढ़े होने से असहनीय स्वस्थ्य पीड़ा व अन्य गंभीर परेशानियां पैदा होती हैं और यदि यह खुला रह जाये तो ना ना प्रकार की समस्या घर कर जाती है इसलिए इस स्थान का किसी भी परिस्थिति में खुला या बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए | गलती से भी इस कोने में कोई बोरिंग, गड्ढा नहीं होना चाहिए | सदैव ही इस स्थान का ऊँचा होना, भारी होना बहुत ही आवश्यक है | यह स्थान घर के वरिष्ट व्यक्ति का स्थान होता है | इस स्थान में दोष होना घर पर प्रेत बढाओ व शक्तियों को भी आमंत्रित करता है तथा परिवार के जो पितृ देवता है उनकी भी कृपा नहीं मिलती अथवा यह पितृदोष का भी सूचक है | यदि नैऋत्य में किसी भी प्रकार का दोष है तो निम्न उपाय बहुत ही लाभकारी होंगे :- 

- राहु यंत्र की प्राण - प्रतिष्टा कर स्थापना विधिपूर्वक करें।
- पितृपक्ष अथवा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी व अमावस्या विधिपूर्वक पूरी श्रद्धा से श्राद्धकर्म का संपादन कर अपने पूर्वजों को संतुष्ट कर कृपा ले |
- वास्तु दोष निवारण यन्त्र की विधिपूर्वक पूरी श्रद्धा से प्राण - प्रतिष्टा कर स्थापना करना भी नैऋत्य दिशा के दोष को दूर करने के अत्यंत लाभकारी है |

- राहु - केतु के मंत्रों का जप स्वयं करें अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से कराएं एवं इनसे सम्बंधित दान किसी दरिद्रनारायण को नियमित करे तो निश्चित लाभ होगा |    
- पूरे कुटुंब के साथ महादेव शिव का दुग्धाभिषेक करे तथा महादेव को कांस्य, रजत या स्वर्ण निर्मित नाग - नागिन का जोड़ा अर्पित कर उसे नैऋत्य दिशा में स्थापित करे |

Thursday, June 16, 2011

|| क्या है मंगल दोष अथवा कुज दोष - प्रभाव तथा दोष निवारण हेतु सरल उपाय ||


मंगल दोष एक ऐसी ज्योतिषीय स्थिति है, जो जिस किसी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, खासकर कन्याओ को तो कही जादा....उनके जीवन में या उनके आस पास किसी भी प्रकार की अशुभ घटना को उनसे जोड़ कर देखा जाता है...तरह तरह के ताने दिए जाते है.... आइये समझे के मंगल दोष है क्या....? और बनता कैसे है...? 
यह सम्पूर्णत: ग्रहों की स्थति पर आधारित है | वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के 1, 4, 7, 8 और 12 वे घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है | यह स्थति विवाह के लिए अत्यंत विनाशकारी और अशुभ मानी जाती है | संबंधो में तनाव व बिखराव, कुटुंब में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है | ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दुसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए | यदि वर और वधु मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दुसरे से के योग से समाप्त हो जाते है | मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, लेकिन वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित कर सकते है | मंगल ग्रह की पूजा के द्वारा मंगल देव को प्रसन्न किया जाता है, तथा मंगल द्वारा जनित विनाशकारी प्रभावों, सर्वारिष्ट को शांत व नियंत्रित कर सकारात्मक प्रभावों में वृद्धि की जा सकती है |

 मंगल दोष शांति के विशेष दान :- 
शास्त्रानुसार लाल वस्त्र धारण  करने से व किसी ब्रह्मण अथवा क्षत्रिय को मंगल की निम्न वास्तु का दान करने से जिनमे -  गेहू, गुड, माचिस, तम्बा, स्वर्ण, गौ, मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है | लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल जनित अमंगल दूर होता है |

आइये मंगल दोष शांति के कुछ सरल उपाय जानते है:- 
1 - चांदी की चौकोर डिब्बी में शहद भरकर हनुमान मंदिर या किसी निर्जन वन, स्थान में रखने से मंगल दोष शांत होता है | 
2 - मंगलवार को सुन्दरकाण्ड एवं बालकाण्ड का पाठ करना लाभकारी होता है |
3 - बंदरों व कुत्तों को गुड व आटे से बनी मीठी रोटी खिलाएं |
4 - मंगल चन्द्रिका स्तोत्र का पाठ करना भी लाभ देता है |
5 - माँ मंगला गौरी की आराधना से भी मंगल दोष दूर होता है |

6 - कार्तिकेय जी की पूजा से भी मंगल दोष के दुशप्रभाव में लाभ मिलता है |

7 - मंगलवार को बताशे व गुड की रेवड़ियाँ बहते जल में प्रवाहित करें |
8 - आटे की लोई में गुड़ रखकर गाय को खिला दें |
9  - मंगली कन्यायें गौरी पूजन तथा श्रीमद्भागवत के 18 वें अध्याय के नवें श्लोक का जप अवश्य करें |
10 - मांगलिक वर अथवा कन्या को अपनी विवाह बाधा को दूर करने के लिए मंगल यंत्र की नियमित पूजा अर्चना करनी चाहिए।
11 - मंगल दोष द्वारा यदि कन्या के विवाह में विलम्ब होता हो तो कन्या को शयनकाल में सर के नीचे हल्दी की गाठ रखकर सोना चाहिए और नियमित सोलह गुरूवार पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाना चाहिए |
12 -  मंगलवार के दिन व्रत रखकर हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से व हनुमान जी को सिन्दूर एवं चमेली का तेल अर्पित करने से मंगल दोष शांत होता है |
13 - महामृत्युजय मंत्र का जप हर प्रकार की बाधा का नाश करने वाला होता है, महामृत्युजय मंत्र का जप करा कर मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक व दांपत्य जीवन में मंगल का कुप्रभाव दूर होता है |
14 - यदि कन्या मांगलिक है तो मांगलिक दोष को प्रभावहीन करने के लिए विवाह से ठीक पूर्व कन्या का विवाह शास्त्रीय विधि द्वारा प्राण  प्रतिष्ठित श्री विष्णु प्रतिमा से करे, तत्पश्चात विवाह करे |
15 - यदि वर मांगलिक हो तो विवाह से ठीक पूर्व वर का विवाह तुलसी के पौधे के साथ या जल भरे घट (घड़ा) अर्थात कुम्भ से करवाएं। 
16 - यदि मंगली दंपत्ति विवाहोपरांत लालवस्त्र धारण कर तांबे के पात्र में चावल भरकर एक रक्त पुष्प एवं एक रुपया पात्र पर रखकर पास के किसी भी हनुमान मन्दिर में रख आये तो मंगल के अधिपति देवता श्री हनुमान जी की कृपा से उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखी बना रहता है |

क्या है....स्वस्थ सुन्दर, मेधावी, संस्कारी संतान प्राप्ति के सरल वास्तु उपाय....?


जिस किसी दंपत्ति को विवाह के वर्षो बाद स्वस्थ होने के बावजूद भी गर्भ धारण नहीं हो पाता या बार-बार गर्भपात हो जाता है, इस समस्या या दोष का एक प्रमुख कारण कुंडली दोष अथवा पितृ दोष एवं घर का वास्तुदोष भी होता है।
1- यदि घर का आंगन पूर्व पश्चिम जादा लम्बा है तो वंश वृद्धि नहीं होती, आंगन का आयताकार उत्तर दक्षिण जादा होना या चौकोर होना आवश्यक है |  
2 - यदि घर की पूर्व दिश बाधित होगी तो भी सांतव वृद्धि में बाधा होती है और दक्षिण का खुला या हल्का होना बार बार संतान की हानि कराता है |
3 - यदि घर के दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य ) और उत्तर पूर्व (इशान) में दोष होगा तो यह परिवार में पितृ दोष का सूचक है, ऐसी इस्थ्ती में भी संतान नहीं होती |  
4 - नव दंपत्ति को शुरु के कुछ काल लगभग एक वर्ष तक घर के उत्तर पश्चिम में रहना गर्भ धारण के लिए लाभकारी होता है |
5 - जिन दम्पतियों का विवाह हुए काफी समय हो गए और गर्भधारण अथवा संतान प्राप्त न हो रही हो तो उन्हें हमेशा घर के पश्चिम, दक्षिण पश्चिम  (नैऋत्य ) या दक्षिण दिशा का कमरा देना चाहिए।

6 - शयन कक्ष की उत्तर - पश्चिम दीवार पर धातु से बनी कोई सौम्य, सात्विक एवं आकर्षक वस्तु लगाएं।
7 - गर्भधारण के बाद  दक्षिण पश्चिम  (नैऋत्य ) में रहे व सोने की व्यस्था दक्षिण सर रख कर करे तथा संतान के जन्म तक बिस्तर की दिशा ना बदलें।

8 - कमरे के उत्तर - पश्चिम छोर पर बच्चों के समूह की तस्वीर टांगे। इससे सामान्य प्रसव में सहायता मिलती है।
9 - ऐसी स्त्री को माणिक या मूंगा पहनने से विशेष लाभ मिलता है।
10 - इस बात का भी विशेष ध्यान रखें कि गर्भ धारण करने के बाद उसके बिस्तर के नीचे की झाड़ू ना लगाएं।
11 - ऐसे काल में वृद्धो व गुरु की सेवा करे |
12 - हरिवंश पुराण का पाठ संतान गोपाल मंत्र का जाप तथा पितृ दोष निवारण घर में अवश्य कराये |

क्या आप अपने नकारात्मक विचार से परेशान है ?


क्या आप अपने नकारात्मक विचार से परेशान है ?
मन में आते है बुरे ख्याल ?
क्या घर से बाहर आप जादा सुखी व प्रसन्न रहते है ? 
क्या आपका आत्मविश्वास दिनों दिन गिरता जा रहा है ? 
क्या आपको अपने घर में आते ही क्रोध व गुस्सा आता है ?

क्या आपका व्यहार अपने परिवार से बहुत ही कठोर और कडवा हो गया है ? 
क्या आपने कभी सोचा....
इसका कारण आपके घर का गंभीर वस्तु दोष भी हो सकता है...........? 
तो जानिए गंभीर वस्तु दोष के सरल चमत्कारी उपाय........


यदि आपको अपने घर या अपने घर के किसी भी कमरे में कुछ जादा ही नकरात्मक विचार आते है या उस कमरे में नकारात्मक उर्जा जादा महसूस होती है तो इसका प्रमुख कारण घर या उस कमरे विशेष में वास्तु दोष का होना है | इस समस्या के कई कारण प्रमुख है, यदि घर की लम्बाई चौड़ाई पूर्व - पश्चिम जादा होगी जिसे वास्तुशास्त्र में सूर्य भेदी भवन कहते है, ऐसा होने से नकारात्मक विचार, बात बात पर क्रोध आना व उत्तेजना का होना, आर्थिक, मानसिक व शारीरिक कष्ट, उच्च रक्तचाप जैसी समस्या का होना माना जाता है | ऐसा तब भी होता है जब घर का उत्तर पूर्व का कोना दूषित होगा या फिर घर के दक्षिण पश्चिम के कोने में कोई गंभीर वास्तु दोष होगा |
1 - घर के ईशान्य कोण में यदि दोष हो तो उसमें ताम्र कलश में जल भर कर, थोड़ी सी हल्दी चूर्ण व पंच रत्न डालकर, कलश पर केसर से स्वास्तिक बनाकर स्थापित करे।
2 - अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करे के घर व घर के हर कमरों में सात्विक, हल्के व शुभ रंग व सजावटी वस्तुओ का ही सयोंजन हो | 
3 - घर में ख़राब विद्युत उपकरण, अनावश्यक वस्तु,  निर्जीव - सूखे पौधे या सूखे फूलों का गुलदस्ता निराशा में वृद्धि करता है क्यूंकि सूखे फूल मृत शारीर के सामान है जिनसे सदैव नकारात्मक उर्जा ही निकलती है तो अच्छे विचार कहाँ से आ सकते है | 
4 - घर में जागृत फूलों का पौधा, गुलदस्ता अवश्य रखे।
5 - आतंरिक सज्जा हेतु उदास, रोती हुई, गंभीर, भद्दी आकृतियां, कलाकृतियों तथा चित्रों का प्रयोग बिलकुल न करे, इनका सीधा प्रभाव व्यक्ति की मनोदशा, स्वास्थ्य व घर की शुभ उर्जा पर पड़ता है |
6 - भवन के अन्दर या आसपास सूखे, जले हुए, कटे, वृक्ष न हो, यह अशुभता में वृद्धि करते है |
7 - भवन में या उसके आस पास को बड़े कारखाने, कर्कश आवाज़े, तनाव युक्त कष्ट का वातावरण जैसे कचहरी, थाना, बिजली घर, अस्पताल, देवी मंदिर न हो क्यूंकि इनके आसपास की नकारात्मक उर्जा भी आपके वास्तु पर बुरा प्रभाव डालती है |
8 - पुराने भवन में अक्सर सीलन की समस्या देखी जाती है जो शास्त्र में वास्तु पुरुष के चर्म रोग के सामान मानी गई है तथा नकारात्मक ऊर्जा का सूचक होती हैं, किसी घर में यदि देवता ही पीड़ित है तो रहने वाले कहाँ से सुखी हो सकते है, ऐसी इस्थ्ती में उसे तत्काल ठीक करा लेना चाइये | 
9 - किसी व्यक्ति का उत्तर पश्चिम दिशा के कमरे में जादा दिन तक नियमित रहना भी उसके बुरे विचार, बुरी आदते, मानसिक तनाव व दिवालियेपन का प्रमुख कारण बनता है |